Monday, November 16, 2009

TUM MERE HO

तुम... जिंदगी का एहसास हो...कुछ सपनों की खुशबू हो कोई फरियाद हो किस से कहूँ ‍कि तुम मेरे हो

...किसी किताब में रखा कोई सूखा फूल हो किसी गीत में रुका हुआ कोई अंतरा हो किसी सड़क पर ठहरा हुआ मोड़ हो
तुम...किसी अजनबी रिश्ते की आंच हो अनजानी धड़कन का नाम हो किसी नदी में ठहरी हुई धारा हो

तुम...किसी आँसू में रुकी हुई सिसकी हो किसी खामोशी के जज्बात हो किसी मोड़ पर टूटा हुआ हाथ हो किससे कहूँ कि तुम मेरे हो

तुम...हाँ, मेरे अपने सपनों में तुम हो हाँ, मेरी आखिरी फरियाद तुम हो हाँ, मेरी अपनी जिंदगी का एहसास हो मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा कितुम मेरी चाहत का एक हिस्सा हो शायद, तुम मेरे हो तुम हाँ... तुम...हाँ, मेरे अपने सपनों में तुम हो हाँ, मेरी आखिरी फरियाद तुम हो हाँ, मेरी अपनी जिंदगी का एहसास हो कोई हाँ, तुम मेरे हो हाँ, तुम मेरे हो हाँ, तुम मेरे हो

PREM

प्रेम को अभिव्यक्त करने की सर्वोत्तम भाषा मौन है, क्योंकि प्रेम मानव मन का वह भाव है, जो कहने-सुनने के लिए नहीं बल्कि समझने के लिए होता है या उससे भी बढ़कर महसूस करने के लिए होता है। प्रेम ही मानव जीवन की नींव है। प्रेम के बिना सार्थक एवं सुखमय इंसानी जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। प्रेम की परिभाषा शब्दों की सहायता से संभव ही नहीं है।सारे शब्दों के अर्थ जहां जाकर अर्थरहित हो जाते हैं, वहीं से प्रेम के बीज का प्रस्फुटन होता है। वहीं से प्रेम की परिभाषा आरंभ होती है। प्रेम का अर्थ शब्दों से परे है।

प्रेम एक सुमधुर सुखद अहसास मात्र है। प्रेम की मादकता भरी खुशबू को केवल महसूस किया जा सकता है। प्रेम का अहसास अवर्णनीय है। इसलिए इस मधुर अहसास के विश्लेषण की भाषा को मौन कहा गया है। प्रेम को शब्द रूपी मोतियों की सहायता से भावना की डोर में पिरोया तो जा सकता है किंतु उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है क्योंकि जिसे परिभाषित किया जा सकता है, जिसकी व्याख्या की जा सकती है, वह चीज तो एक निश्चित दायरे में सिमटकर रह जाती है जबकि प्रेम तो सर्वत्र है। प्रेम के अभाव में जीवन कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं।प्रेम इंसान की आत्मा में पलने वाला एक पवित्र भाव है। दिल में उठने वाली भावनाओं को आप बखूबी व्यक्त कर सकते हैं किंतु यदि आपके हृदय में किसी के प्रति प्रेम है तो आप उसे अभिव्यक्त कर ही नहीं सकते, क्योंकि यह एक अहसास है और अहसास बेजुबान होता है, उसकी कोई भाषा नहीं होती।

प्रेम में बहुत शक्ति होती है। इसकी सहायता से सब कुछ संभव है तभी तो प्यार की बेजुबान बोली जानवर भी बखूबी समझ लेते हैं।प्यार कब, क्यों, कहाँ, कैसे और किससे हो जाए, इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता। इसके लिए पहले से कोई व्यक्ति, विशेष स्थान, समय, परिस्थिति आदि कुछ भी निर्धारित नहीं है। जिसे प्यार जैसी दौलत मिल जाए उसका तो जीवन के प्रति नजरिया ही इंद्रधनुषी हो जाता है। उसे सारी सृष्टि बेहद खूबसूरत नजर आने लगती है। प्रेम के अनेक रूप हैं। बचपन में माता-पिता, भाई-बहनों का प्यार, स्कूल-कॉलेज में दोस्तों का प्यार, दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी का प्यार। प्रेम ही हमारी जीवन की आधारशिला है तभी तो मानव जीवन के आरंभ से ही धरती पर प्रेम की पवित्र निर्मल गंगा हमारे हर कदम के साथ बह रही है। किसी शायर ने क्या खूब कहा है-साँसों से नहीं, कदमों से नहीं,मुहब्बत से चलती है दुनिया।सच्चा प्यार केवल देने और देते रहने में ही विश्वास करता है। जहां प्यार है, वहां समर्पण है। जहां समर्पण है, वहां अपनेपन की भावना है और जहां यह भावना रूपी उपजाऊ जमीन है, वहीं प्रेम का बीज अंकुरित होने की संभावना है।

जिस प्रकार सीने के लिए धड़कन जरूरी है, उसी तरह जीवन के लिए प्रेम आवश्यक है। तभी तो प्रेम केवल जोड़ने में विश्वास रखता है न कि तोड़ने में।सही मायने में सच्चा एवं परिपक्व प्रेम वह होता है, जो कि अपने प्रिय के साथ हर दुःख-सुख, धूप-छाँव, पीड़ा आदि में हर कदम सदैव साथ रहता है और अहसास कराता है कि मैं हर हाल में तुम्हारे साथ, तुम्हारे लिए हूं। प्रेम को देखने-परखने के सबके नजरिए अलग हो सकते हैं, किंतु प्रेम केवल प्रेम ही है और प्रेम ही रहेगा क्योंकि अभिव्यक्ति का संपूर्ण कोष रिक्त हो जाने के बावजूद और अहसासों की पूर्णता पर पहुंचने के बाद भी प्रेम केवल प्रेम रहता है।

Sunday, October 25, 2009

चाहत

समय बीतने के साथ-साथ हम कुछ लोगों के व्यवहार से इतने परिचित हो जाते हैं कि हमें मालूम होता है कि यदि ऐसी स्थिति हुई तो उसकी वैसी प्रतिक्रिया होगी। इसलिए तनाव की गुंजाइश कम होती है क्योंकि हमारी मानसिक तैयारी उस प्रतिक्रिया से सामना करने की बन जाती है। पर बहुत से लोग ऐसे होते हैं कि हम उनके बेहद करीब हों फिर भी हम सुनिश्चित नहीं कर पाते कि किन हालात में उस व्यक्ति विशेष का क्या व्यवहार होगा।अक्सर अप्रत्याशित व्यवहार के कारण यह तनाव और दुविधा बनी रहती है कि न जाने क्या होने वाला है। गुस्सा होगा तो किस हद तक होगा और खुशी होगी तो कितनी देर की होगी। नाराजगी कब तक चलेगी और कैसे मनाया जाए उसे। ऐसे रवैये से रिश्तों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। खासकर वह व्यक्ति ही पीड़ित होता है जिसे यह मनमौजी व्यवहार झेलना पड़ता है। उस व्यक्ति के लिए प्यार करना गुनाह करने के समान हो जाता है। न तो उससे नाता तोड़ते बनता है और न ही पूर्ण रूप से उसे आत्मसात करते बनता है। यह द्वंद्व की स्थिति निश्चित रूप से रिश्ते को मजबूत होने नहीं देती वह कभी तो उसका बेहद ख्याल रखता है और कभी लापरवाह हो जाता है, जैसे उसे उसकी किसी भी परेशानी से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। ऐसा क्या किया जाए कि आप दोनों में समझबूझ विकसित हो जाए या फिर आप उसे भूल जाएँ जोकि आपको असंभव सा लगता है। करता है। दरअसल, जब कोई रिश्ता केवल किसी एक व्यक्ति की जरूरत पर आधारित हो तो उस रिश्ते के स्थायित्व पर प्रश्नचिह्न लग ही जाता है। दोनों के लिए खुशी, चिंता, दुख, ग्लानि की समान गुंजाइश नहीं रहती है। दूसरा व्यक्ति निर्विकार रूप से उस रिश्ते में रहता है। जब मूड हुआ, दया आई या उसे संग और संवाद की जरूरत महसूस हुई तो समय दे दिया वरना अन्य दिनचर्या में उस रिश्ते का स्थान नहीं। अनुभव यही बताते हैं कि केवल किसी एक के कंधे पर ऐसे रिश्ते का बोझ डालकर ज्यादा समय तक नहीं चला जा सकता है। एक अकेला व्यक्ति कहाँ तक संबंध की गाड़ी खींच पाएगा। वह न केवल बुरी तरह थक जाएगा बल्कि टूट भी जाएगा। ऐसे में यदि रिश्ता समाप्त हो जाए तो उसके पास अपना आगे जीवन संवारने के लिए ताकत नहीं बचेगी। ऐसे एकतरफा रिश्ते से जी कड़ा करके निकल जाना चाहिए। यदि दोनों व्यक्ति की चाहत समान नहीं है तो आज न कल उस रिश्ते को टूटना ही है। उसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाएं यही बेहतर है। आपको लग सकता है कि उसके पास समय का अभाव है। लेकिन यदि किसी की नीयत साफ है तो समय की कमी ज्यादा मायने नहीं रखती है। वह वाजिब वजह बता सकते हैं और सामने वाले को उस पर यकीन भी होगा पर यदि किसी व्यक्ति में आपके साथ समय बिताने की इच्छा ही न हो तो वैसे व्यक्ति से समय की कमी का रोना रोना कहाँ की अक्लमंदी होगी। हो सकता है कि आपके साथी के पास सचमुच समय का अभाव हो, वह यह सोचता हो कि आप झगडने के बजाय उसकी इस दिक्कत को समझेंगी। पर, जो बात सबसे ज्यादा इस रिश्ते में अखर रही है, वह है झगड़ा होने पर हमेशा आपके द्वारा पहल करना, मनाना, माफी माँगना। सप्ताह बीतने के बाद भी उसे आपसे संवाद बनाने के लिए तड़प नहीं महसूस होती है बल्कि आप ही बेचैन होकर उसे मनाने चल पड़ती हैं। इसका क्या अर्थ निकाला जाए। आपका दोस्त हमेशा यही सोचता है कि पूरी गलती आपकी है इसलिए माफी भी उसे ही माँगनी पड़ेगी। दूसरा, आप बोलें या रूठे उसकी बला से। घुटने टेकती हैं तो ठीक है वरना आप जाएँ अपनी राह। किसी भी रिश्ते की सबसे दुखद स्थिति है, एक-दूसरे का सम्मान नहीं करना। एक-दूसरे को गंभीरता से नहीं लेना। प्यार व परवाह करना थोड़ा कम हो तो चल सकता है पर कुछ घटने पर जवाबदेही महसूस नहीं करना, उसे बस हलकेपन से लेना, बेहद अपमानजनक स्थिति है। कभी भी झगड़े को सुलझाने के लिए पहल नहीं करना, ऐलानिया तौर पर यह कहना है कि मुझे तुम्हारे दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं है और न ही मैं तुम्हारी भावना की कद्र करता हूँ। पर जब भी दो व्यक्ति के बीच अनबन या झगड़ा होता है तो ज्यादा या कम गलती दोनों की होती है। समझदारी का ठेका केवल एक व्यक्ति को तो सौंपा नहीं जा सकता है न!
आप सँभल जाएँ और परिपक्व व्यवहार करें। आपने बहुत प्यार, दुलार, मनुहार लुटाया है अब उसे भी मौका दें। यदि वह पहल नहीं करता है, लौटकर नहीं आता है तो आपको अपने संबंध के भविष्य का जवाब मिल गया।
आप काफी हद तक समझ गई होंगी कि आपका रिश्ता कितना परिपक्व है। कितनी दूर यह चल सकता है। अपने जीवन में शांति, सुकून और उज्ज्वल भविष्य चाहिए तो अपना जी कड़ा करके एक बार महीना-छह महीना के लिए किसी काम में व्यस्त हो जाएँ। आपको जितनी मानसिक तकलीफ हो, आप उससे संपर्क न करें। अगर उसे सचमुच आपकी दोस्ती और प्यार की जरूरत है तो वह अपनी आदत बदलकर आपसे बात करने की पहल करेगा। अब विचलित और उत्तेजित होने की उसकी बारी है। आप सँभल जाएँ और परिपक्व व्यवहार करें। आपने बहुत प्यार, दुलार, मनुहार लुटाया है अब उसे भी मौका दें। यदि वह पहल नहीं करता है, लौटकर नहीं आता है तो आपको अपने संबंध के भविष्य का जवाब मिल गया। यदि वह समझदारी और सम्मान से पेश आता है तो आप भी उतावलेपन के बजाय थोड़ा धैर्य और समझदारी दिखाएँ। रो-रोकर माँगी हुई भीख से संबंध कितने दिन टिकाऊ और खुशियों भरा हो सकता है, जहाँ दोनों एक दूसरे की भावना का आदर करें और बराबर की चाहत महसूस करे

Saturday, October 10, 2009

मेरी चाहत

मैं चाहता हूँ कि,
तुम्हें ढेर सारा प्यार मिले।
मनचाही खुशियों भरा एक नया संसार मिले।।
बेवफाई की इस अंधेरी दुनिया से कोसों दूर,
वफा के उजालों से भरा एक नया द्वार मिले..।

मैं चाहता हूँ कि,
तुम्हारे कदमों को भी एक नया साथ मिले।।
आईना बनकर सामने खड़ी रहो तुम,
ताकि दोनों रुहों को भी प्यार भरे जज्बात मिले..॥


मैं चाहता हूँ कि,
तुम्हारी झोली में हो इन्द्रधनुष के सातों रंग।
तुम हमेशा मुस्कुराती रहो रंगबिरंगी तितलियों के संग।।
मेरे इन ख्वाबों को भी एक सही मुकाम मिले,
इन अफसानों को भी हकीकत का नया नाम मिले ।।

मेरी जीवन संगनी

अँधेरी‍ रात में
जगमगाता दिया हो तुम
मेरी जीवनसंगिनी
मेरी प्राणप्रिया हो तुम

थामा है तुमने
जब से मेरा हाथ
तबसे जागी है मुझमें
जीवन जीने की आस

उम्र का यह पड़ाव
नहीं लगता अब मुझे भारी
गर मिलो तुम हर जनम
तो हँस के रूखसती की
कर लूँ मैं तैयारी

साथी चले हो तुम
दो कदम साथ
तो जीवनभर साथ निभाना
तन्हाई में छोड़ अकेला मुझे
तुम कहीं चली ना जाना।

प्यार में जल्दबाजी ना करो

जब हमें कोई चीज पसंद आती है तो हम उसे पाने के लिए तड़प उठते हैं। सारी कोशिश यही रहती है कि वह चीज हमें किसी भी तरह मिल जाए। जमीन-आसमान एक करने के बाद वह चीज हमें मिल तो जाती है पर थोड़े ही दिनों में हमें महसूस होने लगता है कि वह चीज हमारी उम्मीद पर खरी नहीं उतरी। पछतावा होता है कि नाहक हमने अपनी उतनी मेहनत, धन और समय उस पर बरबाद किया। ठीक यही तजुर्बा व अहसास रिश्तों में जल्दबाजी करने पर भी होता है। प्यार के रिश्ते की शुरुआत करने में धीमी गति से आगे बढ़ना बहुत ही समझदारी भरा लव मंत्र है।

जब दो लोग किसी भी कारणवश बार-बार मिलते हैं तो काम के अलावा भी संवाद बनता है। रोजमर्रा की बातों में हँसी-मजाक भी शामिल होने लगता है। पहचान बढ़ती जाती है तो एक-दूसरे से कभी तबीयत का हालचाल भी पूछने लगते हैं। भूख की बात सुनने पर कोई अपना टिफिन भी पेश कर देता है। कार्य या पढ़ाई आदि की समस्या आने पर सलाह-मशविरा भी करने लगते हैं। ज्यों-ज्यों सहजता बढ़ती जाती है प्रतिक्रिया ज्यादा निजी होती जाती है।

पोशाक, हेयर स्टाइल, स्मार्ट लुक, दुखी चेहरा, खुशी का कारण जैसे कमेंट करना आम बातचीत का हिस्सा बन जाता है। ये सारी बातें आम व्यवहारिकता की बातें हैं। इसे प्यार के रिश्ते की शुरुआत या बुनियाद नहीं कहा जा सकता। पर ऐसी ही सहज बातचीत को कई बार व्यक्ति बहुत ही गंभीरता से लेने लगता है। उसे उन सारी नोंक-झोंक और रोजमर्रा की मिजाज पुर्सी में प्यार का गुमान होने लगता है। अमूमन यह वहम पाल लिया जाता है कि सामने वाला भी प्यार में मुबतला है और इसीलिए सभी सहज व्यवहार को विशेष दृष्टि से देखने की कोशिश की जाती है। यदि बीमार पड़ने पर हमदर्दी के साथ हालचाल पूछ लिया गया तो प्यार का अनुमान लगाने वाली बात और भी पक्की मान ली जाती है।

मजेदार बात यह है कि सामने वाला बस इस व्यवहारिकता को सहजता से निभाता जा रहा होता है लेकिन मन में प्यार की गलतफहमी पालने वाला हर टिप्पणी, हर सहयोग, हंसी, छुअन आदि को बस प्यार की मुहर लगाकर ही देखने लगता है। जबकि सामने वाला इस विशेष विश्लेषण से बिल्कुल अनजान है। उसे रत्ती बराबर भी अंदेशा नहीं होता है कि उसके सामान्य से व्यवहार का अलग मतलब निकाला जा रहा है। उसे क्या पता है कि अपने मन में प्यार की खयाली दुनिया बसाकर कोई बहुत ही आगे बढ़ चुका है। और उसके बाद जब प्यार के मुगालते में रहने वाला अपनी मन की बात उस व्यक्ति के समक्ष रखता है तो सामने वाला हक्का-बक्का सा रह जाता है क्योंकि वह खुद को सामान्य दोस्त से ज्यादा कुछ भी नहीं समझता है। बहुत संभव है कि उसका पहले से ही किसी के साथ प्यार का रिश्ता हो।



अक्सर ऐसे लोग आत्महीनता एवं अविश्वास की भावना का शिकार हो जाते हैं। जीवन के किसी मोड़ पर जब उसे सही व्यक्ति मिलता है तो वह उस पर भी भरोसा नहीं कर पाता है।



ऐसे में जब वह व्यक्ति अपनी स्थिति साफ करता है तो प्यार का इजहार करने वाले के पैर के नीचे से जमीन खिसक जाती है। वह अवसाद में डूब जाता है। उसे लगता है उसके साथ धोखा हुआ है। उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया है। इलजाम यह लगाया जाता है कि पहले से ही यह स्थिति क्यों नहीं साफ की गई। वह यह मानने को तैयार नहीं होता है कि इतनी नजदीकियाँ नहीं थी कि उसे प्यार के रिश्ते के बारे में बताया नहीं जाता। यदि सामने वाला भलमनसाहत में नम्रता से पेश आता है और गलतफहमी से पहुँचने वाले दुख के प्रति संवेदनशीलता का भाव रखता है तो और भी मुश्किलें ज्यादा बढ़ जाती हैं।

इसकी वजह से एक तो प्रेम का इजहार करने वाला व्यक्ति उस मनोदशा से निकल नहीं पाता है, दूसरा यह मायने भी निकाला जाता है कि सामने वाले की गलती है इसीलिए उसे गिल्ट फील हो रहा है। इससे इजहार करने वाले की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है और उस भ्रम को तोड़ पाना कठिन हो जाता है। वह बहुत दिनों तक मानसिक तनाव से गुजरता है।

अक्सर ऐसे लोग आत्महीनता एवं अविश्वास की भावना का शिकार हो जाते हैं। जीवन के किसी मोड़ पर जब उसे सही व्यक्ति मिलता है तो वह उस पर भी भरोसा नहीं कर पाता है। उसका आत्मविश्वास इतना हिल चुका होता है कि किसी की भावना की गहराई को न तो वह समझ पाता है और न ही उसका सही आकलन कर पाता है। सबसे दुखद यह होता है कि वह जीवन भर किसी के सामने कोई भी प्रस्ताव रखने से डरता है। दोस्तों, प्यार के मामले में जल्दबाजी करना ठीक नहीं है।
संपूर्ण मानव समाज के लिए प्रेम एक सर्वोत्तम सौगात है। प्रेम प्रकृति का वह अनमोल उपहार है जो मानव जाति के अस्तित्व हेतु अति आवश्यक है। यदि मनुष्य के हृदय से प्रेम समाप्त हो जाए तो मानव जाति के विनाश को शायद कोई न रोक सके।

प्रेम वह मधुर अहसास है जो जीवन में मिठास घोल देता है। कटुता दूर करने व वात्सल्य तथा भाईचारे के संचार में प्रेम की महती भूमिका है। मगर अफसोस! आज प्रेम का वह शाश्वत रूप नहीं रहा। प्रेम की नैसर्गिक अनुभूति आज आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गई है। वर्तमान में प्यार जैसे शब्द से सभी परिचित होंगे मगर सच्चे प्यार की परिभाषा क्या है, यह बहुत कम लोग जानते हैं।




वास्तव में तो प्यार अभी तक प्यार है जब तक उसमें विशालता व शुद्धता कायम है। अशुद्ध व सतही प्यार न केवल दो हृदयों के लिए नुकसानदायक है बल्कि भविष्य में जीवन के स्याह होने की वजह भी बन जाता है।



विशुद्धतम वही है जो प्रतिदान में कुछ पाने की लालसा नहीं रखता। आत्मा की गहराई तक विद्यमान आसक्ति ही सच्चे प्यार का प्रमाण है। सच्चा प्यार न तो शारीरिक सुंदरता देखता है और न ही आर्थिक या शैक्षणिक पृष्ठभूमि। सच्चा प्यार बस, प्रिय के सामिप्य का आकांक्षी होता है। निर्निमेष दृष्टि से देखने की भोली चाह के अतिरिक्त प्यार शायद ही कुछ और सोचता हो। वास्तव में तो प्यार अभी तक प्यार है जब तक उसमें विशालता व शुद्धता कायम है। अशुद्ध व सतही प्यार न केवल दो हृदयों के लिए नुकसानदायक है बल्कि भविष्य में जीवन के स्याह होने की वजह भी बन जाता है।

सच्चे प्यार का अहसास किया जा सकता। इसे शब्दों में अभिव्यक्त करना न केवल मुश्किल है बल्कि असंभव भी है। सच्चे प्यार में गहराई इतनी होती है कि चोट लगे एक को, तो दर्द दूसरे को होता है, एक के चेहरे की उदासी से दूसरे की आँखें छलछला आती हैं। सच्चे प्रेम का 'पुष्प' कोमल भावनाओं की भूमि पर आपसी विश्वास और मन की पवित्रता के संरक्षण में ही खिलता और महकता है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि इसकी कोमल पंखुड़ियों पर सामाजिक बदनामी की अम्ल वर्षा करें या इसकी जड़ों को विश्वास एवं समर्पण के अमृत से सींचें।